तुम निभा सकते थे कह दो तुम्हारा मन न था
प्यार तो प्यार था रस्मों का कोई बंधन न था
मैं हमेशा जिसमें सूरत देख संवरती रही
संगमरमर की चमक थी आँख का दर्पण न था भीड़ में उस दिन तुम्हें जिसने पुकारा था
प्यार का एहसास ही था मेरा पागलपन न था
उम्र भर की बदनसीबी ही तब भी साथ थी
आखिरी पल आंसू ही थे पी का दामन न था
तुम निभा सकते थे कह दो तुम्हारा मन न था
प्यार तो प्यार था रस्मों का कोई बंधन न था

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