Monday, 25 March 2013




तुम निभा सकते थे कह दो तुम्हारा मन न था 
प्यार तो प्यार था रस्मों का कोई बंधन न था 

मैं हमेशा जिसमें सूरत देख संवरती रही 
संगमरमर की चमक थी आँख का दर्पण न था 
भीड़ में उस दिन तुम्हें जिसने पुकारा था
प्यार का एहसास ही था मेरा पागलपन न था

उम्र भर की बदनसीबी ही तब भी साथ थी
आखिरी पल आंसू ही थे पी का दामन न था

तुम निभा सकते थे कह दो तुम्हारा मन न था
प्यार तो प्यार था रस्मों का कोई बंधन न था 

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