Sunday, 31 March 2013







रात ढलती रही

मैं और चाँद 

एक दूजे को तकते रहे 

चाँद मेरी तरह पिघलता रहा 

नींद में सारी रात चलता रहा 

जाने किस गम में गिरफ्ता था 

मुंह पे बादल को ओढता रहा 


मैं भी रात की चादर में लिपटी रही 


यादो के जंगल में भटकती रही


और वो मुझेसे दूर भागता रहा 


कोई तो था जो साथ मेरे चलता रहा 


ख्वाब ही ख्वाब में बहलाता रहा


बस उसके एहसासों में 


रात ढलती रही....

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